दीवाली मेरे बचपन की


आज पुरानी जेब टटोली यादोँ की , तो याद आया
खन-खन करते कुछ सिक्कोँ मेँ खोया बचपन मैनेँ पाया

मावस की वो रात दिवाली लेकर जब आ जाती थी
छज्जे से नीली – पीली झालरियाँ जब मुस्काती थीँ

जेब फुलाए ‘सीको’ से हम घर-भर मेँ ऊधम मचाते थे
बीच-बीच मेँ पापा का ‘लेक्चर’ भी हँस के पी जाते थे

साँझ ढले माँ मिट्टी के दीपोँ की थाल सजाती थी
उन दीपोँ की जगमग लौ मानो मावस को नाक चिढ़ाती थी

पापा, पापा , ” क्योँ हर दीवाली चंदा मामा ‘एब्सेँट’ हो जाते हैँ
जबकि सारे तारे आसमान मेँ अपनी ‘प्रेज़ेँट’ लगाते हैँ ”
पापा की शर्ट खीँच के छुटकी ने जब उनसे ये पूछा था
माथे पे उँगली रख पापा ने फिर बड़े ‘सीरियसली’ सोचा था

वो दीवाली क्या थी … जाने क्या मालूम
कहाँ खो गयी वो दीवाली …. जाने क्या मालूम
सबसे पूछा यादोँ की धुँधली तस्वीरेँ दिखलाकर
सबने बोला कहाँ छुपी है , कहाँ गयी है …. जाने क्या मालूम !!

वो तस्वीर


कई बरसोँ से
ये तस्वीर
इक नज़र तलाश रही थी
वो नज़र
जो देखे इसे
नज़र भर के …

धूल की परतेँ
वक्त के साथ
और गहरी हो चुकी हैँ
इस तस्वीर मेँ
आँखोँ से पिघलता पानी भी
नहीँ हटा पाया जिन्हेँ
अच्छी तरह से….

ये तस्वीर
जो समेटे है
अनगिनत यादेँ
अतीत के
उन लम्होँ की
जो शायद
कैद रहेगेँ
हमेशा इस तस्वीर मेँ
आजादी को तरसते ..!

कितनी अजीब है ना
ये जिन्दगी
यहाँ
वक्त बदल जाता है
लोग बदल जाते है

शुक्र है
ये तस्वीरेँ
अपनी आदत नहीँ बदलती

तुम अब भी
इस तस्वीर मेँ
मेरे साथ हो
और हमेशा रहोगे ॥

इंसान को इंसान रहने दीजिए


इंसान को इंसान रहने दीजिए
इसे मज़हबोँ मेँ ना बाँटिए
ये जमीँ है, राम ‘औ’ रहीम की
इसे सरहदोँ मेँ ना बाँटिए

मंदिर की आरती मस्ज़िद मेँ जा मिले
मस्ज़िद की अज़ान को मंदिर मेँ पनाह मिले
दंगोँ मेँ खून से लथपथ शहर जो छोड़ आए है
उन लावारिस परिँदो को एक मुकम्मल जहाँ मिले

माना कि बोए कुछ ने यहाँ बीज धर्म-जात के
पर है गुज़ारिश आपसे कि नफरतेँ ना काटिए

इंसान को इंसान रहने दीजिए
इसे मज़हबोँ मेँ ना बाँटिए
ये जमीँ है, राम ‘औ’ रहीम की
इसे सरहदोँ मेँ ना बाँटिए

खिल जाए फूल प्यार के, हर एक बाग मेँ
संगीत भी नया मिले, कोयल की राग मेँ
चूल्हेँ मेँ रोटियाँ सिकेँ, हो इंसानियत का स्वाद
कोई घर अब और ना जले, रंजिशोँ की आग मेँ

उनकी मासूम मुस्कुराहट पे हमेशा प्यार आता है
बच्चोँ की हँसी, मज़हब की छलनी से ना छाँटिए

इंसान को इंसान रहने दीजिए
इसे मज़हबोँ मेँ ना बाँटिए
ये जमीँ है, राम ‘औ’ रहीम की
इसे सरहदोँ मेँ ना बाँटिए

लौट आओ


बेतरतीबी से बिखरी
मेरी ज़िन्दगी
पूछती है तुम्हारा पता..
तुम कहाँ हो ..?
मैँ नि:शब्द…
ढूढ़ँता बहाने
उसे बहलाने के लिए…

वो पूछती है
तारीखेँ
तुम्हारे लौट आने की
उसी घर मेँ
जो अब खंडहर से ज्यादा कुछ नहीँ
मेरा दिल…!

क्या जवाब दूँ
जिन्दगी को अब
तुम ही आ कर
बता दो ना….

बाबू और बुढ़ऊ


आफिस मेँ बैठा बाबू मन्द मन्द मुस्काए
चपरासी ने पूछा कारण, बोले देखो वही बुढ़ऊ हैँ आए

वही बुढ़ऊ हैँ आए जिनको पेँशन है लेनी
कल बोला था उनको कि ‘लक्ष्मी’ पड़ेगी देनी

लगता है आज हम पे किस्मत बड़ी मेहरबान है
इसलिए तो हमारा भारत महान है ॥

लगता है चुनाव आ गया


हुई हलचल गली मेँ फिर आज
लगता है चुनाव आ गया
कुछ हैँ कौऐ, तो कुछ हैँ बाज
लगता है चुनाव आ गया

खादी पहने, टोपी लगाए
खुद को कहता नेता
धूर्त बड़ा ये प्राणी है
जो सबकी कहकर लेता

पाँच साल तक पिसते-पिसते जनता भयी बुरादा
पर इसका बैलेँस डबल हो गया
प्रापर्टी और भी ज्यादा

तोहरी आ गयी है शामत आज
लगता है चुनाव आ गया
हुई हलचल गली मेँ फिर आज
लगता है चुनाव आ गया

बिना डकारे, माल पचाकर
तोँद फुलाए बैठा
जिसने पहुँचाया संसद तक
उसे ही भुलाए बैठा

सत्ताधारी या इच्छाधारी
क्या मैँ इन्हेँ पुकारूँ
इस चुनाव मेँ इनके सर पे
वोट का बम दै मारूँ

अबकी जनता दूर करेगी सारी खाज
लगता है चुनाव आ गया
हुई हलचल गली मेँ फिर आज
लगता है चुनाव आ गया